रत्न सिंहासन या राजगद्दी वह स्थान है जहाँ श्री राम भगवान ने 11000 वर्ष बैठ के राज किया. उन्होंने यहाँ बैठ के ही अपनी प्रजा का न्याय किया. जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम लंका के राजा रावण का वध करके पहली बार अयोध्या वापस आये, तब उनका राज्याभिषेक इसी सिंहासन पर किया गया. हर्षित होकर देवताओं ने फूल बरसाए, इंद्र कुबेर ने सोने चांदी एवं मणियों से सवा प्रहर तक राज्याभिषेक किया. पूरे अयोध्या को दीपों से सजाया गया. इस मन्दिर के गर्भ गृह में प्रभु श्री राम जी हैं, दाहिने तरफ लक्ष्मण जी और बाएं तरफ जगत माता सीता जी विराजमान हैं . उनके पीछे अत्यंत प्राचीन विग्रह हैं, जो कि लगभग 2070 वर्ष पहले राजा विक्रमादित्य को सरयू जी में स्नान करते समय मिले थे.. उनमें से बाएं तरफ चांदी के राम और सोने की सीता जी विराजमान हैं. यह सिंहासन अत्यंत कीमती है. सिंहासन का द्वार पांच मन चाँदी से बना हुआ है तथा सवा दो मन चाँदी से यह सिंहासन बना हुआ है. मन्दिर परिसर में सीता रसोईं भी है, जिसमें बैठी हुयी सीता जी की प्रतिमा है. रसोई में चकला बेलन व रसोई में उपयोग होने वाली अन्य वस्तुएं भी रखी हैं.इसके समीप सीता महल भी बना हुआ है.