स्वर्ग द्वारे नरःस्नात्वादृष्टवा नागेश्वरम शिवम्।
पूज यित्वाच विधिवत सर्वान का मान्वाप्न्युयात !!
नागेश्वरनाथ मन्दिर भारत वर्ष के108 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग है।
सरयू नदी किनारे स्वर्ग द्वार पर स्थित श्री नागेश्वरनाथ मन्दिर बाहर से देखने में बेहद साधारण लगता है, परमान्यता और पौराणिकता के आधार पर यह मन्दिर विशेष महत्व रखता है. यह मन्दिर राम की पैड़ी पर है, ऐसा माना जाता है कि यह मन्दिर लाखों वर्ष पहले भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र श्री कुश के द्वारा स्थापित किया गया था.
मन्दिर के महंत के अनुसार जिस समय भगवान राम अपने निज धाम को जाने लगे तो अयोध्या का राज्य अनजनी नंदन हनुमान को एवं चिरंजीव कुश को कुशावर्त (कुशावतीनगरी) क्षेत्र का राज्य दे गए थे. अपने राज्य का संचालन करते हुए श्री कुश जी को अयोध्या दर्शन की इच्छा जाग्रत हुयी. इस विचार से वे सरयू अयोध्या आये, दर्शन के पश्चात स्वर्ग द्वार तीर्थ में सर यू स्नान करने लगे. तभी उनके हाथ का स्वर्ण कंगन सरयू जी के जल में गिर गया. स्वर्ण कंगने को नाग कन्याकु मुद्द्धी ने पाया, और वह उसे लेकर पाताल लोक चली गयीं. जब खोज करने पर भी कुश जी को कंगन नहीं मिला तो वह क्रोधित हुए,
उन्होंने पाताल लोक का नाश करने का संकल्प ले लिया. कुश ने रौद्र रूप को देख कुमुद भय भी तहुयी और भगवान शंकर की प्रार्थना करने लगीं. भगवान शंकर ने कुश के क्रोध से बचाने के लिए दर्शन दिए. भगवान शंकर को देखकर कुश जी का क्रोध ख़त्म हो गया. उन्होंने धनुष बाण रख दिया एवं साष्टां ग प्रणाम कर उनका षोडषो पूजन किया और कहा किनाग की प्रार्थना पर प्रसन्न होकर आप यहाँ प्रकट हुए इसलिए इस स्थान की नागेश्वर नाथ के नाम से प्रसिद्धि हो. यही स्वर्ग द्वार पवित्र तीर्थ में नागराज के संर क्ष्नार्थ श्री कैस्लाश नाथ भगवान शंकर जी आये इसी से इन का नाम नागेश्वर नाथ पड़ा.
स्वर्ग द्वार स्थित इस मन्दिर के उत्तर पूर्व एवं पश्चिम में 3 विशाल दरवाजे हैं, गर्भ गृह में नागों से वेष्टित प्रधान शिवलिंग है. इसकी विशेषता है कि यहअर्ध्य गोलाकार है, इसके सम्मुख मातेश्वरी जग दम्बामाँ के दिव्य दर्शन है. गर्भगृह के बाहर मन्दिर प्रांगण में दक्षिण भि सुण्डी श्री गणेश जी हैं एवं नन्दी के तीन श्री विग्रह सुण्डी के सम्मुख हैं, इसकेअतिरिक्त बगल में राम मन्दिर एवं नन्दी के श्वर के दर्शन हैं. मन्दिर के बाहर स्तंभों पर गणों एवं देवी देवताओं के विग्रह हैं जो मूर्ति कला की द्रष्टि से बड़े ही महत्वपूर्ण और दर्शनीय हैं.