क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या के प्राचीन मन्दिरों में से एक है. इस मन्दिर में स्वयंभू शिवलिंग का प्राकट्य इस मन्दिर को विशेष बनाता है. मन्दिर के पुजारी के अनुसार मन्दिर के गर्भ गृह में स्वम्भू शिवलिंग, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर में शिवलिंग के समान है. क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या फैजाबाद मार्ग पर श्री राम हॉस्पिटल के ठीक सामने स्थित है. मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण मन्दिर के दर्शन सुगम हो जाते हैं. क्षीरेश्वर मन्दिर महादेव का मन्दिर है. ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त इस मन्दिर में स्थापित शिवलिंग की पूरे विधि विधान से पूजा करता है उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पूर्वज मान्धाता के कोई पुत्र नहीं था. पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर मान्धाता ने इस स्थान पर 11 वर्ष तक कामधेनु गाय के दूध से रुद्राभिषेक किया था. इस रुद्राभिषेक में क्षीर अर्थात दूध की इतनी मात्रा एकत्रित हुयी कि मन्दिर के निकट क्षीर सागर बन गया था. मन्दिर के आस पास का क्षेत्र आज भी क्षीरसागर के नाम से जाना जाता है. 11 वर्ष लगातार रुद्राभिषेक के बाद मान्धाता को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी. इसी मान्यता के आधार पर ऐसे दंपत्ति यहाँ आकर रुद्राभिषेक करते हैं, जिन्हें संतान सूख नहीं प्राप्त होता है. एक और मान्यता के अनुसार कभी इस मन्दिर के समक्ष, दूर से कुबेर भी नित्य महादेव के दर्शन करते थे. कुबेर की नित्य आराधना से महादेव प्रसन्न हुए थे. तभी से यह मान्यता रही है कि जो भक्त नित्य मंदिर में रुद्राभिषेक करता है उसे धन और सम्पन्नता की कमी नहीं रहती.
विगृह : मन्दिर के भीतर, केंद्र में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित हैं, तथा मन्दिर के परिक्रमा क्षेत्र में नन्दी, गौरी, गणेश, कार्तिक विराजमान है.
पूजन विधि : मंदिर में नित्य षोडषोचार विधि से पूजन होता है. यहाँ नित्य रुद्राभिषेक भी होता है. नित्य दिन प्रातः महादेव को स्नान करवा कर उनका श्रृंगार किया जाता है, इसके पश्चात प्रातः 4 बजे मंगला आरती के साथ भक्तों के लिए मन्दिर के कपाट खोले जाते हैं. दोपहर में भोग आरती के साथ भगवान को भोग लगाया जाता है. सायं 6 बजे पुनः श्रृंगार होने के बाद रात्री 9:30 बजे शयन आरती होती है. मन्दिर के कपाट अगली सुबह तक के लिए बंद कर दिए जाते हैं. सावन और मलमास के दिनों में यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है. अश्तिग शुक्ल पक्ष की एकादशी में यहाँ पूजन का विशेष महत्व है.