यह तीर्थ सिखों के लिए अत्यंत पवित्र है. सिखों के प्रथम नवं एवं दसम गुरुओं ने इस धरती पर अपने श्री चरण रखे. गुरुओं के आने और यहाँ प्रवचन देने से इस स्थान की महत्ता और बढ़ गयी. उसके पूर्व से यह स्थान ब्रम्ह कुण्ड के नाम से जाना जाता था. बताया जाता है जब श्री राम अयोध्या पूरी को आये थे, उस समय सारे देवता यहाँ आये थे राजतिलक देने के लिए. राजतिलक में ब्रम्हा जी भी आये थे. राज्याभिषेक होने के बाद ब्रम्हा जी ने राम चन्द्र जी से कहा कि मेरा भी उद्धार करो, तब श्री राम चन्द्र जी ने कहा कि तुम तप करो. पहले इस जगह का प्राचीन नाम तीर्थराज था. ब्रम्हा जी ने श्रृष्टि निर्माण से पूर्व यहाँ 5000 वर्ष तप किया. तब से इस स्थान का नाम ब्रम्ह कुण्ड पड़ा. इसी ब्रम्ह कुण्ड स्थान पर सिखों के ब्रम्ह स्वरुप गुरु साहिब जी आये और यह स्थान गुरुद्वारा ब्रम्ह कुण्ड नाम से प्रसिद्द हुआ. सिखों के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जू महाराज हरिद्वार से जगन्नाथपुरी की यात्रा को जाते समय संवत 1575 विक्रमी में सरयू तट पर विराजे, उन्होंने यहाँ एक वृक्ष के नीचे सत्संग भी किया. इसी प्रकार से सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज अपनी आसाम यात्रा से आनंदपुर साहब (पंजाब ) जाते समय संवत 1725 विक्रमी में उक्त स्थान (श्री गुरुनानक देव जी) के मंजी साहब पर मत्था टेका.तथा सामने ही बैठकर 48 घंटे अखंड तप किया, वह इस पवित्र स्थान से धन्य होकर अपने चरण पादुका अपने एक सेवक को भेंट स्वरुप दे गए थे, जिन्हें आज भी ब्रम्हकुण्ड गुरूद्वारे में प्रदर्शनी के तौर पर रखा गया है. संवत 1729 विक्रमी में पटना से आनंदपुर जाते समय माता गुजरी जी मामा कृपाल चन्द्र जी के साथ सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविन्द सिंह जी इस स्थान पर पधारे थे. उस समय से इस स्थान पर बंदरों को चने भी खिलाने की प्रथा है . उस समय गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने सेवकों को उनके शस्त्र, तीर, खंजर, चक्र भेंट कर गए. जो कि गुरुद्वारा परिसर में आज भी संरक्षित हैं और दर्शन के लिए उपलब्ध रहते हैं. यह गुरुद्वारा सरयू तट के किनारे बना हुआ. यहाँ से सरयू के विहंगम दृश्य को महसूस किया जा सकता है. यहाँ प्रत्येक रविवार लंगर चलता है. तथा गुरु पर्व पर झांकी और उत्सव का आयोजन होता है.