मणि पर्वत
मणि पर्वत मन्दिर लगभग 200 फीट ऊँचे टीले पर स्थित है. इसकी छत से पुरे अयोध्या के दर्शन होते हैं. भगवान श्री राम के विवाह के पश्चात से यहाँ झूले की परंपरा चली आ रही है. मान्यता है कि झुला महोत्सव के रूप में मनाये जाने वाले इस अवसर पर अयोध्या में विराजमान समस्त भगवान यहाँ झूला झूलने आते हैं. सावन के महीने में माता सीता ने जी ने इस स्थान पर पंचमी मनाई थी, झूला झूली थी. तभी से यहाँ झूला उत्सव मनाया जाता है. यह उत्सव शुक्ल पक्ष तृतीया से शुरू होता है और पूर्णिमा तक चलता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा जनक ने राजा दशरथ को इतनी मणियाँ दी थीं कि यहाँ पहाड़ बन गया. इस लिए इसका नाम मणि पर्वत रखा गया है. जब भगवान राम के विवाहोपरांत जनक जी अयोध्या नगरी आये तो उन्होंने सोचा अयोध्या में भगवान राम का नाम, रूप, लीला धाम चारों मिल जाते हैं. इसका महात्म्य जान के जनक जी ने दशरथ जी से जमीन खरीदी थी , उसी जमीन की कीमत में उन्होंने इतनी मणि उपहार में भेजी कि यह टीला बन गया. एक और प्रसंग में इस बात का उल्लेख किया गया है कि जब भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण को मेघनाद ने युद्ध के दौरान घायल कर दिया था तो उनहे संजीवनी बूटी की जरूरत थी और हनुमान जी संजीवनी बूटी वाला पूरा पहाड़ ही उठाकर ले आए थे। किवंदतियों के अनुसार, पहाड़ का छोटा सा हिस्सा यहां गिर गया था। यह माना जाता है कि भगवान बुद्ध, अयोध्या में 6 साल रूके थे और उन्होने मणि पर्वत पर ही अपने शिष्यों को धर्म का ज्ञान दिया था। इस पर्वत पर सम्राट अशोक के द्वारा बनवाया एक स्तुप है। इस पर्वत के पास में ही प्राचीन बौद्ध मठ भी है।