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विजय राघव मन्दिर

विजय राघव मन्दिर

अयोध्या को मन्दिरों की नगरी भी कहा जाता है, यहाँ करीबन 7000 से अधिक मन्दिर हैं. पर विजय राघव मन्दिर अपने आप में निराला मन्दिर है.  यह रामानुज सम्प्रदाय का प्राचीन एवं प्रमुख मन्दिर   है. जो कि विभीषण कुण्ड के सामने स्थित है. मन्दिर की स्थापना 1904 के लगभग स्वामी बलरामाचारी द्वारा की गयी थी. इस मन्दिर में स्थापित प्रभु राम के विगृह को दक्षिण भारत से ही लाया गया था. यह मन्दिर रामानुज सम्प्रदाय के अत्यंत महत्व वाला मन्दिर है. वैष्णवों के लिए यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है. इस मन्दिर में अनुशासन के साथ गुरुकुल एवं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण किया जाता है. यह अयोध्या का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ आज के आधुनिक काल में भी विद्युत् की व्यवस्था नहीं है. और न ही विद्युत् से चलने वाले उपकरणों का उपयोग किया जाता है.मान्यता है कि बिजली की चकाचौंध में भगवान श्री राम के आभा मण्डल के दर्शन नहीं हो पाते हैं. और इन अप्राकृतिक उजाले के सामने भगवान की आँखें चौंधिया जाती हैं. इस लिए शाम होते ही इस मन्दिर में उजाले की वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी होने लगती है. मन्दिर परिसर में जगह जगह लालटेन की रौशनी में पूजा अर्चना, भोग प्रसाद व अन्य कार्य होते हैं. मन्दिर परिसर में अभी 3 जीवित कुएं हैं.  भगवान के भोग और प्रसाद के लिए रसोई में बने कुएं के प्राकृतिक पानी का उपयोग किया जाता है. तथा भोजन के लिए पत्तलों और कुल्हड़ का इस्तेमाल होता है. यहाँ सभी खाद्य पदार्थ और भोग प्रसाद शुद्ध देशी घी में बनता है. मन्दिर परिसर में ही एक गौशाला है. गायों की सेवा के लिए गौशाला में बने कुएं के पानी का उपयोग किया जाता है. एक अन्य कुएं से आगंतुकों के पीने की व्यवस्था होती है. मन्दिर के भीतर भगवान को हवा करने के लिए छत में पंखा झलने की व्यवस्था है. साथ ही आरती के समय श्रद्धालुओं के लिए भी हस्त बेना की व्यवस्था है. मन्दिर परिसर में बने विश्रामगृहों में शयन और विश्राम के लिए कम्बलों का उपयोग किया जाता है.

विगृह :

गर्भ गृह में भगवान श्री राम, लक्ष्मण माता जानकी के मुख्य विग्रह हैं, यह विगृह अष्टधातु के हैं. तथा यहाँ 1000 से अधिक शालिग राम विराजमान हैं.

भोग/ पूजा विधि :

यहाँ नित्य उत्तर पूर्व दिशा में महाभारत का पाठ, उत्तर पश्चिम में रामयाण का पाठ, पश्चिम दक्षिण में श्रीमद भगवत पुराण तथा दक्षिण पूर्व में विष्णु पुराण का पाठ होता है. किसी भी पूजा विधि या पाठ में गलती न होने का विशेष ध्यान रखा जाता है. यहाँ पूजा विधि और उसकी उसकी सुचिता का विशेष ध्यान रखा जाता है, नित्य प्रातः 7:30 भोर आरती के साथ मन्दिर के कपाट दर्शन के लिए खुलते हैं, मध्यान्ह 12 बजे भोग आरती के बाद सायं आरती 7 बजे होती है, रात्रि में 8 बजे शयन आरती के पश्चात मंदिर के कपाट बन्द कर दिए जाते हैं.

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